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>> Monday, November 23, 2009


सरकारी कर्मचारी
सरकारी कर्मचारी इस बात पर नाराज़ हैं कि समय पर आना अनिवार्य हो गया है.
पश्चिम बंगाल में सरकारी कमर्चारियों की लेट-लतीफी बीते तीन दशकों के दौरान एक परंपरा बन गई है. अब जब राज्य सरकार जब इस पुरंपरा को बदलने का प्रयास कर रही है तो उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
वामपंथी ट्रेड यूनियनों के सदस्य भी सरकार के इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं. सरकार ने बीते मंगलवार को एक अधिसूचना जारी कर कर्मचारियों से सुबह दस बजे तक दफ्तर पहुंचने और शाम पांच बजे दफ्तर छोड़ने का निर्देश दिया था. लेकिन उसके बाद भी राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डंग में ज्यादातर कर्मचारी अपनी पुरानी परपंरा का पालन करते हुए देर से दफ्तर पहुंच रहे हैं.

निगरानी करने वाले ही लेट


दिलचस्प बात यह है कि जिन हाजिरी बाबुओं को बाकी कर्मचारियों की लेट-लतीफी का ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे खुद भी देर से दफ्तर आ रहे हैं.
सरकार अब अचानक नींद से जागी है. लेकिन तीन दशक में कर्मचारियों में देर से आने और जल्दी घर जाने की परंपरा की जड़े काफी गहरी हो चुकी हैं. अब इसमें कोई बदलाव संभव नहीं है
सौगत रॉय

यही नहीं, एक दिन बाद ही सरकार के इस फैसले के खिलाफ राइटर्स बिलिडंग में कर्मचारियों ने धरना और प्रदर्शन शुरू कर दिया. लगातार देर से दफ्तर पहुंचने वाले कर्मचारी इस धरने के लिए दफ्तर के तय वक़्त से पहले ही मौके पर पहुंच गए थे.
सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि सरकार एक अधिसूचना से हमारी जीवन शैली नहीं बदल सकती. हम कोई बंधुआ मजदूर नहीं हैं. ज्यादातर कर्मचारी सुबह 11 बजे के बाद दफ्तर आते हैं और शाम चार बजते ही निकल जाते हैं.
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कोई आठ साल पहले पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद कर्मचारियों की कार्यसंस्कृति सुधारने के लिए ‘डू इट नाऊ" का नारा दिया था. लेकिन जल्दी ही उनके इस नारे ने दम तोड़ दिया.

यह कैसा अंकुश


एक सरकारी कर्मचारी कहते हैं,"राजनीतिक और प्रशासनिक मोर्चे पर मुंह की खाने के बाद सरकार अब चुनावों से पहले अपनी छवि सुधारने के लिए ही कर्मचारियों पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही है."
इन कर्मचारियों में वे भी हैं जो माकपा और वाममोर्चा के कट्टर समर्थक हैं. कृषि शोध संस्थान के कर्मचारियों को सरकारी अधिसूचना की कोई फिक्र नहीं है. अधिसूचना जारी होने के अगले दिन उनके संयुक्त निदेशक आशीष हुई खुद लगभग 11 बजे दफ्तर पहुंचे. देर से आने वाले कर्मचारियों पर निगाह रखने का जिम्मा उन पर ही है.
सरकारी कर्मचारी
दफ़्तर ग्यारह बजे तक ख़ाली ही पड़े रहते हैं

वाम विरोधी कर्मचारी संगठन ‘नवपर्याय" के महासचिव तपन चक्रवर्ती कहते हैं, "इस सरकार ने कर्मचारियों की लगातार उपेक्षा की है. सरकार पहले हमारे बकाया भत्तों का भुगतान कर कर्मचारियों को प्रोन्नति दे. उसके बाद ही हाजिरी की बात हो सकती है."
वाममोर्चा से संबद्ध सरकारी कर्मचारियों की समन्वय समिति के संयुक्त सचिव मनोज गुहा कहते हैं, "हम अधिसूचना के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन अफसरों पर भी यह नियम लागू होना चाहिए. अफसरों को मोटी तनख्वाह के अलावा सरकारी गाड़ी मिलती है. इसके बावजूद वे समय पर दफ्तर नहीं पहुंचते."
वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता कहते हैं, "पहले जारी अधिसूचना में सबसे बड़ी कमी यह थी कि हाज़िरी रजिस्टर की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी. अब इस कमी को दूर कर दिया गया है."
वे कहते हैं, "सरकार वरिष्ठ अफसरों को लिए भी ऐसे दिशानिर्देश जारी करने पर विचार कर रही है."
हम अधिसूचना के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन अफसरों पर भी यह नियम लागू होना चाहिए. अफसरों को मोटी तनख्वाह के अलावा सरकारी गाड़ी मिलती है. इसके बावजूद वे समय पर दफ्तर नहीं पहुंचते
कर्मचारी नेता

केंद्रीय मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के नेता सौगत राय कहते हैं, "सरकार अब अचानक नींद से जागी है. लेकिन तीन दशक में कर्मचारियों में देर से आने और जल्दी घर जाने की परंपरा की जड़े काफी गहरी हो चुकी हैं. अब इसमें कोई बदलाव संभव नहीं है."
अधिसूचना जारी होने के बाद भी कर्मचारियों ने अपनी पुरानी परंपरा नहीं तोड़ी है. इससे परेशान सरकार अब इस मामले में और कड़ाई बरतने का मन बना रही है.
वित्त मंत्री कहते हैं कि एक सप्ताह की निगरानी के बाद सरकार इस मामले में कुछ और निर्देश जारी करेगी. यानी फ़िलहाल सरकारी कर्मचारियों की यह परंपरा जस की तस रहेगी.

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