Tribute To Bhagat Singh, Sukhdev And Rajguru

>> Tuesday, March 23, 2010


March 23 1931, could be a normal date for the world but for India it is a day pride. This is the day when our Independent India leaders, Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru sacrificed their lives for their motherland.
 
Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru fought for the independence till their last breath and trembled the foundation of British Government.
 
Even today, the new generation of India respect theses fighters and see them as their role model and icon. The teachings, slogans, thoughts which these great martyrs have given to the people of India are still remembered and are relevant even today as they were earlier.  
 
But, today India is dividing on the name of religion caste, state. And it is not done by any outsider it is done by the political leaders and local insurgents like Maoists and Naxalites.
 
These local insurgents who want to divide India on the name of freedom should first know the meaning of independence. They are killing innocent people and damaging public properties to solve their purpose.

“If the deaf are to hear, the sound has to be very loud. When we dropped the bomb, it was not our intention to kill anybody.” - A Tribute to Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru-Jai Hind

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Appraisal meeting of Sachin (If he is in a Software Company)

>> Friday, March 19, 2010


200 Runs/ 147Balls/ 25X4 / 3X6 


 
 
Agree you have done GREAT BUT BUT BUT BUT
   
25 x 4s = 100
3 x 6s   =  18
 
IT implies that you have done 118 Runs in 28 Balls.
 
And 12 x 2s = 24
       58 x 1s = 58
 
IT means you have done all 200 Runs in only 98 balls 
 
So you have wasted 147-98 = 49 balls 
 
Considering only 1 run scored on each of these balls
 you could have earned 49 valuable RUNS FOR OUR TEAM
 
MANAGER’S COMMENT: So you only met the expectations and NOT EXCEEDING (though anyone of our team could not do it) and your Grade is  MEDIUM 
                                       
Trainings for him: Learn how to STEAL singles. ( you better know what I mean with stealing single) 

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वक़्त नहीं - No time !

>> Sunday, March 7, 2010


वक़्त  नहीं  "
हर  ख़ुशी  है  लोगों  के  दा मन  में,  
पर  एक  हंसी  के लिए  वक़्त  नहीं ... 

दिन  रात  दौड़ती  दुनिया  में
ज़िन्दगी  के  लिए  ही  वक़्त  नहीं . 
माँ की  लोरी  का  एहसास  तो   है
पर  माँ  को  माँ  कहने  का  वक़्त  नहीं
सारे  रिश्तों  को  तो  हम  मार  चुके
अब  उन्हें  दफ़नाने  का  भी  वक़्त  नहीं

सारे  नाम  मोबाइल   में  हैं
पर  दोस्ती  के  लिए  वक़्त  नहीं
गैरों  की  क्या  बात  करें
जब  अपनों  के  लिए  ही  वक़्त  नहीं

आँखों  में  है  नींद  भरी
पर  सोने  का  वक़्त  नहीं
दिल  है  ग़मों  से  भरा  हुआ
पर  रोने  का  भी  वक़्त  नहीं.

पैसों  की दौड़  में  ऐसे  दौड़े
कि थकने  का  भी  वक़्त  नहीं
पराये  एहसासों  की  क्या  कद्र  करें
जब  अपने  सपनो  के  लिए  ही  वक़्त नहीं.. 

तू  ही  बता    ज़िन्दगी
इस  ज़िन्दगी  का  क्या  होगा
कि  हर  पल  मरने  वालों  को
जीने  के  लिए  भी  वक़्त  नहीं.........

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आखिर देश का असली मुसलमान कहां गया !

>> Wednesday, March 3, 2010




भारतीय मुसलमानों को समझना आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि देश में उनकी अनेक छवियां बनी हुई हैं।इनमें से ज्यादातर छवियां मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित हैं। उदाहरण के तौर पर भारत के जाने-माने अंग्रेजी लेखक खुशवंत सिंह के मत में एक सामान्य मुसलमान वह है जिसके 8-10 बच्चे होते हैं, वह बनियान-लुंगी पहन कर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर पान की पीक थूकता नजर आएगा। एक अन्य लेखिका तवलीन सिंह के विचार में एक सामान्य मुसलमान रूढ़िवादी होता है।


अमेरिका और कुछ बड़े मीडिया घरानों की मुसलमानों के बारे में यह धारणा है कि वे सभी बिन लादेन, बाबर, मुल्ला उमर, मौलाना मसूद अजहर आदि के अनुयायी हैं और इनके द्वारा प्रचारित आतंकवाद की हिमायत करने वाले हैं। संघ परिवार के कुछ लोग तो मुसलमानों की तुलना गद्दारों से करते हैं और उन्हें देशभक्त नहीं मानते। उनके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट और हॉकी के मुकाबलों में पाकिस्तान की तरफदारी करते हैं। 


पिछड़ों जैसी मानसिकता 

मीडिया का ही एक हिस्सा एक आम मुसलमान के बारे में ऐसा मानता है कि वह भोजन में नमक अधिक होने पर, पत्नी के साड़ी पहन लेने पर, किसी बात पर जरा सा गुस्सा आने पर उसे तुरंत प्रताड़ित कर तलाक दे देता है। वह परिवार नियोजन में विश्वास नहीं रखता, घेटो (एक अलग-थलग बस्ती) में रहने वाले लोगों जैसी मानसिकता रखता है, आधुनिक शिक्षा से दूर रहता है, वंदे मातरम् का विरोध करता है, बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण, सलमान रश्दी, तस्लीमा नसरीन, डेनिश कार्टून आदि के चक्रव्यूह में फंसा रहता है आदि। मुसलमानों की एक और छवि यह बनाई गई है कि वे अपनी अंधेरी, बदबूदार, जर्जर बस्तियों में रहना पसंद करते हैं। उनके बच्चे गलियों की कीचड़-मिट्टी में लोटते रहते हैं और गुल्ली-डंडा या प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेलते रहते हैं। मुसलमानों के बारे में मीडिया की बनाई गई छवियों में से एक छवि यह है कि वे अपनी औरतों और बच्चियों को आधुनिक तो क्या, प्राचीन शिक्षा भी देना पसंद नहीं करते है। वे औरतों को अपने समाज में कोई हक नहीं देते, जिससे मुस्लिम महिलाएं लाचारी का जीवन बिताती हैं। मुस्लिम पुरुष जब चाहते हैं, तब शादी कर लेते हैं और जब चाहते हैं तलाक भी दे देते हैं और यह नहीं सोचते कि तलाक देने से उस औरत का क्या होगा।



बेवजह गुणगान 

इसके अलावा मुसलमानों की एक और छवि यह है कि वे सद्दाम हुसैन, तालिबान, अरब देशों जैसे फलस्तीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि के गुणगान में लगे रहते हैं, जबकि इन देशों को भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं। आम मुसलमानों के बारे में एक छवि भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई है। इनके अनुसार सभी मुसलमान अल्पसंख्यकवादी हैं और वे चुनाव में प्राय: मुस्लिम प्रत्याशी को ही वोट देते हैं। यह भी माना जाता है कि मुसलमान धर्म के आधार पर मतदान करते हैं आदि।

सचाई यह है कि इन सभी छवियों में से मुसलमान की एक भी छवि वास्तविक नहीं है। मुस्लिम विचारक और लेखक अजीज बर्नी के मुताबिक, मुसलमान की बस एक ही छवि है कि वह टूट कर इस्लाम को चाहने वाला होता है, अपने रसूल से बेपनाह मुहब्बत करता है और अपने धर्म, रसूल पर किसी भी समय मर-मिटने के लिए तैयार रहता है। पर एक सही बात यह भी है कि इन बनी-बनाई छवियों के आधार पर भारत में बसे मुसलमानों का आकलन नहीं हो सकता।

जब देश का विभाजन हो रहा था तो उस समय भारत के बहुलतावादी समाज के समर्थक स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से एक ऐसा झकझोर कर देने वाला भाषण दिया था कि पाकिस्तान जाने वाले अनेक लोगों ने अपने बिस्तरबंद खोल दिए थे और मौलाना के इस शेर पर लब्बैक कहा था (सहमति जताई थी), 'जो चला गया उसे भूल जा, हिंद को अपनी जन्नत बना।'

पर यहां रुक जाने और इस वतन को अपना मानने के बावजूद भारतीय मुसलमान को शक की नजर से क्यों देखा जाता रहा है? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि खुद उसके मन में यहां के समाज को लेकर कोई डर बैठ गया था? असल में, विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों के मन में असुरक्षा, हताशा और अनिश्चितता की भावना समा गई थी। समाज विश्लेषक वी. एन. पांडे ने इस स्थिति का उल्लेख करते हुए लिखा है, 'मुसलमानों को आशाएं कम थीं और भय अधिक थे।'

नेतृत्व से मिली उपेक्षा 

एक विडंबना मुसलमानों के नेताओं के साथ रही, जिनके कारण आज मुसलमान इतने पिछड़े हुए हैं। अगर मुस्लिम नेता ईमानदारी से अपने समुदाय के नेतृत्व की बागडोर संभालते तो आज मुसलमानों की तुलना समाज के सबसे पिछड़े वर्गों से नहीं होती। एक तो अपने नेताओं की उपेक्षा और दूसरी तरफ वैमनस्य का वातावरण, इन दोनों वजहों से भारतीय मुसलमानों में खीझ बढ़ती गई और वे मुख्य धारा से दूर खिंचते चले गए। उनके इस रवैये से सांप्रदायिकता की आग को भी हवा मिली। इन सारी वजहों के नतीजे में आज भारत का मुस्लिम समुदाय मुसलमान बिखरा-बिखरा सा नजर आता है।

भारतीय मुसलमान की दशा में सुधार आ सकता है, बशर्ते इस समुदाय की रूढ़ हो चुकी छवि में कोई सुधार हो। इसके लिए सबसे पहली जरूरत यह है कि हमारा मुस्लिम समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान के मुद्दों से परे हटे। मुसलमान अपने को मुख्य धारा से जितना हटा कर अपने अलग-थलग प्रमाणित करना चाहेंगे, अपनी छवि सुधारने में उन्हें उतना ही ज्यादा वक्त लगेगा। उन्हें एक सामान्य मनुष्य व देश के अन्य नागरिकों के समान अधिकारों की मांग और जिम्मेदारियों की पहचान करनी होगी। साथ ही दूसरे धर्मों-समुदायों के लोगों के साथ सद्भावना के साथ समानता पर आधारित तालमेल बिठाने की गुंजाइश पैदा करनी होगी।



Source:www.nbt.in

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