>> Sunday, November 29, 2009



Apni Biwi ko apni 100% kamai dene se 10% Sukh milta hai.
Kisi doosri ko apni kamai ka 10% dene pe 100% sukh milta hai
... Paisa apka ... Faisla apka ...:P

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Every person is a FREEDOM FIGHTER ........ Immediately after Marriage !!
                                              JAI HIND!!

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"Don't be serious, be sincere."!!

>> Thursday, November 26, 2009





We are like a pre-paid card with limited validity. If we are lucky, we may last another 50 years. And 50 years is just 2,500 weekends. Do we really need to get so worked up? …………….
It's ok, bunk a few classes, scoring low in couple of papers, goof up a few interviews, take leave from work, fall in love, little fights with your spouse. We are people, not programmed devices........." :)

"Don't be serious, be sincere."!!

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UNESCO announces INDIAN NATIONAL ANTHEM as the BEST National Anthem in the World

>> Tuesday, November 24, 2009




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Bengal Tigers - Please Dont ask us to come on Time "ShameLess Citizens"

>> Monday, November 23, 2009


सरकारी कर्मचारी
सरकारी कर्मचारी इस बात पर नाराज़ हैं कि समय पर आना अनिवार्य हो गया है.
पश्चिम बंगाल में सरकारी कमर्चारियों की लेट-लतीफी बीते तीन दशकों के दौरान एक परंपरा बन गई है. अब जब राज्य सरकार जब इस पुरंपरा को बदलने का प्रयास कर रही है तो उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
वामपंथी ट्रेड यूनियनों के सदस्य भी सरकार के इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं. सरकार ने बीते मंगलवार को एक अधिसूचना जारी कर कर्मचारियों से सुबह दस बजे तक दफ्तर पहुंचने और शाम पांच बजे दफ्तर छोड़ने का निर्देश दिया था. लेकिन उसके बाद भी राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डंग में ज्यादातर कर्मचारी अपनी पुरानी परपंरा का पालन करते हुए देर से दफ्तर पहुंच रहे हैं.

निगरानी करने वाले ही लेट


दिलचस्प बात यह है कि जिन हाजिरी बाबुओं को बाकी कर्मचारियों की लेट-लतीफी का ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे खुद भी देर से दफ्तर आ रहे हैं.
सरकार अब अचानक नींद से जागी है. लेकिन तीन दशक में कर्मचारियों में देर से आने और जल्दी घर जाने की परंपरा की जड़े काफी गहरी हो चुकी हैं. अब इसमें कोई बदलाव संभव नहीं है
सौगत रॉय

यही नहीं, एक दिन बाद ही सरकार के इस फैसले के खिलाफ राइटर्स बिलिडंग में कर्मचारियों ने धरना और प्रदर्शन शुरू कर दिया. लगातार देर से दफ्तर पहुंचने वाले कर्मचारी इस धरने के लिए दफ्तर के तय वक़्त से पहले ही मौके पर पहुंच गए थे.
सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि सरकार एक अधिसूचना से हमारी जीवन शैली नहीं बदल सकती. हम कोई बंधुआ मजदूर नहीं हैं. ज्यादातर कर्मचारी सुबह 11 बजे के बाद दफ्तर आते हैं और शाम चार बजते ही निकल जाते हैं.
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कोई आठ साल पहले पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद कर्मचारियों की कार्यसंस्कृति सुधारने के लिए ‘डू इट नाऊ" का नारा दिया था. लेकिन जल्दी ही उनके इस नारे ने दम तोड़ दिया.

यह कैसा अंकुश


एक सरकारी कर्मचारी कहते हैं,"राजनीतिक और प्रशासनिक मोर्चे पर मुंह की खाने के बाद सरकार अब चुनावों से पहले अपनी छवि सुधारने के लिए ही कर्मचारियों पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही है."
इन कर्मचारियों में वे भी हैं जो माकपा और वाममोर्चा के कट्टर समर्थक हैं. कृषि शोध संस्थान के कर्मचारियों को सरकारी अधिसूचना की कोई फिक्र नहीं है. अधिसूचना जारी होने के अगले दिन उनके संयुक्त निदेशक आशीष हुई खुद लगभग 11 बजे दफ्तर पहुंचे. देर से आने वाले कर्मचारियों पर निगाह रखने का जिम्मा उन पर ही है.
सरकारी कर्मचारी
दफ़्तर ग्यारह बजे तक ख़ाली ही पड़े रहते हैं

वाम विरोधी कर्मचारी संगठन ‘नवपर्याय" के महासचिव तपन चक्रवर्ती कहते हैं, "इस सरकार ने कर्मचारियों की लगातार उपेक्षा की है. सरकार पहले हमारे बकाया भत्तों का भुगतान कर कर्मचारियों को प्रोन्नति दे. उसके बाद ही हाजिरी की बात हो सकती है."
वाममोर्चा से संबद्ध सरकारी कर्मचारियों की समन्वय समिति के संयुक्त सचिव मनोज गुहा कहते हैं, "हम अधिसूचना के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन अफसरों पर भी यह नियम लागू होना चाहिए. अफसरों को मोटी तनख्वाह के अलावा सरकारी गाड़ी मिलती है. इसके बावजूद वे समय पर दफ्तर नहीं पहुंचते."
वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता कहते हैं, "पहले जारी अधिसूचना में सबसे बड़ी कमी यह थी कि हाज़िरी रजिस्टर की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी. अब इस कमी को दूर कर दिया गया है."
वे कहते हैं, "सरकार वरिष्ठ अफसरों को लिए भी ऐसे दिशानिर्देश जारी करने पर विचार कर रही है."
हम अधिसूचना के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन अफसरों पर भी यह नियम लागू होना चाहिए. अफसरों को मोटी तनख्वाह के अलावा सरकारी गाड़ी मिलती है. इसके बावजूद वे समय पर दफ्तर नहीं पहुंचते
कर्मचारी नेता

केंद्रीय मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के नेता सौगत राय कहते हैं, "सरकार अब अचानक नींद से जागी है. लेकिन तीन दशक में कर्मचारियों में देर से आने और जल्दी घर जाने की परंपरा की जड़े काफी गहरी हो चुकी हैं. अब इसमें कोई बदलाव संभव नहीं है."
अधिसूचना जारी होने के बाद भी कर्मचारियों ने अपनी पुरानी परंपरा नहीं तोड़ी है. इससे परेशान सरकार अब इस मामले में और कड़ाई बरतने का मन बना रही है.
वित्त मंत्री कहते हैं कि एक सप्ताह की निगरानी के बाद सरकार इस मामले में कुछ और निर्देश जारी करेगी. यानी फ़िलहाल सरकारी कर्मचारियों की यह परंपरा जस की तस रहेगी.

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>> Friday, November 20, 2009



"No One has ever won a game of Chess by moving forward alone.


Some time u have to move backward to get da better step Forward"


Thats Life ....."

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Celebration means.......

>> Thursday, November 19, 2009



Celebration means...... 


Four friends.

Bahar barsaat.

no raincoat, no umbrella



Celebration means...... 


3 old friends.

3 separate cities.

3 coffee mugs.

1 internet messenger. 


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What is Inflation !

>> Tuesday, November 17, 2009


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मुल्ला जी से बच के!

>> Monday, November 16, 2009


मुल्ला जी से बच के!

देवबंद
हाल में देवबंद में जमीयते-उलेमा-हिंद का तीसवां अधिवेशन हुआ
'हम मुसलमान हैं, हमें आधुनिक शिक्षा नहीं चाहिए. अगर ग़लती से कभी शिक्षा के बारे में सोचा तो किसी ऐसे स्कूल में बच्चों को नहीं भेज सकते जहाँ वंदे मातरम् गाया जाता है. कारण यह कि वंदे मातरम् पढ़ा नहीं कि इस्लाम ख़तरे में पड़ा.
फिर, यदि ऐसे आधुनिक इंगलिश मीडियम स्कूल में बच्चो को भेजा जहाँ लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ते हों तो निसंदेह बच्चे बिगड़ जाएंगे और अगर हमारी मुस्लिम बच्चियाँ दसवीं के बाद किसी ऐसे स्कूल में चली गईं जहाँ परदे का माक़ूल इंतज़ाम नहीं तो तौबा-तौबा बड़ा कुफ्र हो जाएगा'.
ये है देवबंद में होने वाले जमीयते-उलेमा-ए-हिंद (महमूद गुट) के अधिवेशन का मुसलमानो को संदेश. अब सवाल यह है कि सरकारी स्कूल मे वंदे मातरम् का डर और अंग्रेज़ी मीडियम स्कूलों में ईमान बिगड़ने का भय तो फिर मुसलमान बच्चे पढ़ें तो पढ़ें कहाँ...
बच्चे घर बैठें इससे बेहतर तो यही होगा कि हम उनको मदरसे भेज दें. लेकिन जमीयत के आदेशानुसार बच्चा किसी ऐसे मदरसे में नहीं जाना चाहिए जो किसी सरकारी बोर्ड से जुड़ा हो, क्योंकि ऐसे मदरसों में धर्म का ज्ञान कम और आधुनिक ज्ञान ज़्यादा दिया जाता है.
तब ही तो जमीयत ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की मदरसा बोर्ड स्थापित करने की पहल रद्द कर दी.
राय
अब प्रश्न ये है कि इस आधुनिक युग में जो बच्चे मदरसे से पढ़ कर निकलेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा?
जो लोग इस निज़ामे-तालीम (मदरसों) से पढ़ कर निकल रहे हैं उनका कोई मसरफ़ (उपयोगिता) नहीं है, वह केवल कोई मस्जिद पकड़ कर बैठें, या कोई मदरसा चलाएं या फिर वाज़गोई (धार्मिक प्रचार प्रसार) का पेशा इख़्तियार करें और तरह-तरह के मज़हबी झगडे़ छेड़ते रहें ताकि क़ौम को उनकी ज़रूरत महसूस होती रहे.
मौलाना मौदूदी
सच पूछिए तो इस संबंध में मेरी अपनी कोई राय नही है. हाँ, मैं मदरसों की उपयोगिता के बारे में मौलाना अबुल आला मौदूदी के विचार प्रस्तुत कर देता हूँ. मौलाना मौदूदी पाकिस्तान जमाते- इस्लामी के संस्थापक और एक महान इस्लामी विचारक भी थे.
अब देखिए मौलाना मौदूदी मुस्लिम मदरसों के बारे में अपने एक लेख में क्या लिखते हैं: "जो लोग इस निज़ामे-तालीम (मदरसों) से पढ़ कर निकल रहे हैं उनका कोई मसरफ़ (उपयोगिता) नहीं है, वह केवल कोई मस्जिद पकड़ कर बैठें, या कोई मदरसा चलाएं या फिर वाज़गोई (धार्मिक प्रचार प्रसार) का पेशा इख़्तियार और तरह-तरह के मज़हबी झगडे़ छेड़ते रहें ताकि क़ौम को उनकी ज़रूरत महसूस होती रहे.’’
अब आप समझे मुल्ला क्या चाहते है? ऐसे स्कूल मत जाओ जहाँ वंदे मातरम् पढ़ना पड़े, लड़कियों को दस साल बाद पर्दे में बैठा दो और बच्चों को किसी ऐसे मदरसे में भी मत भेजो जिसका संबंध सरकारी बोर्ड से हो क्योंकि ऐसे मदरसे सें आधुनिक शिक्षा लेकर बच्चा आधुनिक युग का एक व्यक्ति बन सकता है.
मुल्ला जगत में सारी समस्या आधुनिकता की है. मुसलमान किसी प्रकार से आधुनिक युग से जुड़ने ना पाए. समस्या यह है कि उलेमाए-दीन (धर्म गुरू) अपने को एक ऐसी इस्लामी सभ्यता का संरक्षक समझते हैं जिसका पतन 1857 में मुग़ल सम्राज्य के बिखरने और अंग्रेज़ों के उदय के साथ हो गया था.
वर्ष 1857 तक इस उप-महाद्वीप में एक बादशाही राजनैतिक परंपरा थी. शिक्षा-दीक्षा के लिए मदरसे थे. न्याय पालिका में इंसाफ़ के लिए क़ाज़ी थे. सारांश यह कि 1857 तक मुसलमान का अपना एक जगत था जो अंग्रेज़ों के आने से छिन्न-भिन्न हो गया.
जामा मस्जिद, दिल्ली
इसे मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था
मतलब यह है कि 1857 के बाद मुसलमानों ने सदियों से जो एक सभ्यता बनाई थी वह सभ्यता और उसके मूल्य सब बेमानी हो गए, हारे हुए मुसलमानों ने अपनी पुरानी सभ्यता को बचाने के लिए 1860 के दशक में देवबंद में एक मदरसा खोला जो पुराने मूल्यों को बचाने की एक तहरीक थी. उसी मानसिकता ने आगे जमीयते-उलेमा-ए-हिंद का रूप धारण कर लिया.
आधुनिकता का विरोध
इस प्रकार देवबंद और जमीयत अंग्रेज़ और उसकी आधुनिक सभ्यता के विरूद्ध खड़े हो गए. अंग्रेज़ तो चले गए लेकिन आधुनिक सभ्यता के ख़िलाफ़ जेहाद आज भी जारी है. पिछले डेढ़ सौ वर्षों में दुनिया बदल गई पर देवबंद की मानसिकता नहीं बदली.
एक समय था जब मुसलमान के लिए अंग्रेज़ी पढ़ना हराम था. अब यह बात खुल कर नहीं कही जा सकती है. उसी बात को अब देवबंद और जमीयत यूँ कहती हैं कि वंदे मातरम् वाले स्कूल में बच्चें को मत भेजो, लड़कियों को परदे वाले स्कूल में रखो, मदरसों मे आधुनिक शिक्षा का समावेश कम से कम करो, सरकारी मदरसा बोर्ड को मत मानो. क्या यह सब आधुनिकता का विरोध नहीं है?
अब मुस्लिम समाज को यह तय करना होगा कि मुल्ला जिस आधुनिकता का विरोध कर रहे हैं, वह उसके हक़ में हैं या नहीं! अतीत और भविष्य की इस खींच-तान में इसको मुल्ला और आधुनिकता में से एक को चुनना होगा. अगर उसने अब भी यह फ़ैसला नहीं किया तो मुल्ला वंदे मातरम् जैसे झगड़े खड़ा करता रहेगा. आख़िर में भारतीय मुसलमानो की छवि भी तालेबानी मुसलमान की छवि बनकर रह जाएगी. इसलिए, ज़रा मुल्ला जी से बच के...!

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>> Wednesday, November 11, 2009

सफ़र में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो, सभी हैं भीड़ में तुम भी आगे निकल सको तो चलो. राहें कहां किसी के लिए बदलती हैं, तुम अपने आप को अगर बदल सको तो चलो...

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>> Tuesday, November 10, 2009

 जिन्दगी की असली उड़ान अभी बाकी है, हमारे हौंसलों का इम्तहान अभी बाकी है। अभी नापी है मुठ्ठी भर जमीं हमने, आगे अभी सारा आसमान बाकी है.....!

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Fatwa against Vande Mataram

>> Monday, November 2, 2009

Jamiat-e-Ulema has issued a fatwa against Vande Mataram, according to news reports. According to the fatwa Muslims should not sing the national song. The fatwa was not in the written agenda of the Ulema convention.


जमीयत उलेमा हिंद ने देश के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को गैर-इस्लामिक करार देते हुए इसके खिलाफ फतवा सुना दिया है। जमीयत के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि मुसलमान को वंदे मातरम् नहीं गाना चाहिए। खास बात यह है कि केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम और संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट मंगलवार को इस अधिवेशन के समापन समारोह में पहुंचेंगे।

जमीयत के प्रमुख और राज्यसभा सांसद मौलाना महमूद मदनी व राष्ट्रीय अध्यक्ष कारी मोहम्मद उस्मान की मौजूदगी में उलेमा ने कुल 25 प्रस्ताव पास किए। जो अन्य प्रस्ताव पास हुए हैं उनमें से ज्यादातर केंद्र सरकार के लिए राहत कम और चुनौती ज्यादा हैं। उलेमा ने जिहाद की आड़ में आतंकवाद और बेगुनाहों के खून को साफ तौर पर गैर इस्लामिक कृत्य व अपराध करार दिया है और आधुनिक शिक्षण केंद्रों की स्थापना का प्रस्ताव एक राय से पास किया।

अधिवेशन ने यूपीए सरकार के महत्वाकांक्षी महिला रिजर्वेशन बिल को अनावश्यक बताते हुए खारिज कर दिया।ईसाई और कादयानी मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन पर भी उलेमा ने विरोधी तेवर दिखाए हैं। उलेमाओं की राय है कि सच्चर कमेटी रिपोर्ट पूरी तरह से लागू की जाए।

इस बीच, मुस्लिम लॉ बोर्ड ने जमीयत के फतवे को जायज ठहराते हुए कहा है कि मुस्लमान अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत नहीं कर सकते। बोर्ड के मेंबर कमल फारुकी ने कहा कि हम देश से प्रेम करते हैं लेकिन पूजा नहीं कर सकते।

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