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>> Thursday, April 1, 2010
कभी महिलाओं का आरक्षण तो कभी मुसलमानों का आरक्षण. आलू , प्याज, दाल, चावल, पेट्रोल के दाम भले ही आसमान छू रहे हों लेकिन राजनीतिक और मीडिया जगत में तो बस अब आरक्षण की धूम है.
बस अब न महँगाई पर बहस और न भ्रष्टाचार पर कोई बात. कहा न यहाँ तो आरक्षण का मौसम है. अब कम से कम दो चुनाव आरक्षण के मुद्दे पर ही होंगे.कोई महिला आरक्षण के पक्ष में है तो कोई विरोध में. किसी को मुस्लिम समाज का उद्धार केवल आरक्षण में दिख रहा है तो किसी को मुस्लिम आरक्षण से देश टूटता दिख रहा है.
महिलाएँ और मुस्लिम समाज आरक्षण से कितना सशक्त होगा यह तो एक शताब्दी बाद इतिहास तय करेगा, हाँ अभी तो आरक्षण के इस राजनीतिक मौसम में कुछ राजनितिक पार्टियों का ही सशक्तिकरण होगा. यही कारण है कि अब क़रीब एक दशक तक आरक्षण पर ही बहस होगी.
कहा न, अब तो भारतीय राजनिति पर आरक्षण का बुखार चढ़ा हुआ है. बस अब आरक्षण, आरक्षण और आरक्षण ही होगा.

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