आखिर देश का असली मुसलमान कहां गया !

>> Wednesday, March 3, 2010




भारतीय मुसलमानों को समझना आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि देश में उनकी अनेक छवियां बनी हुई हैं।इनमें से ज्यादातर छवियां मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित हैं। उदाहरण के तौर पर भारत के जाने-माने अंग्रेजी लेखक खुशवंत सिंह के मत में एक सामान्य मुसलमान वह है जिसके 8-10 बच्चे होते हैं, वह बनियान-लुंगी पहन कर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर पान की पीक थूकता नजर आएगा। एक अन्य लेखिका तवलीन सिंह के विचार में एक सामान्य मुसलमान रूढ़िवादी होता है।


अमेरिका और कुछ बड़े मीडिया घरानों की मुसलमानों के बारे में यह धारणा है कि वे सभी बिन लादेन, बाबर, मुल्ला उमर, मौलाना मसूद अजहर आदि के अनुयायी हैं और इनके द्वारा प्रचारित आतंकवाद की हिमायत करने वाले हैं। संघ परिवार के कुछ लोग तो मुसलमानों की तुलना गद्दारों से करते हैं और उन्हें देशभक्त नहीं मानते। उनके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट और हॉकी के मुकाबलों में पाकिस्तान की तरफदारी करते हैं। 


पिछड़ों जैसी मानसिकता 

मीडिया का ही एक हिस्सा एक आम मुसलमान के बारे में ऐसा मानता है कि वह भोजन में नमक अधिक होने पर, पत्नी के साड़ी पहन लेने पर, किसी बात पर जरा सा गुस्सा आने पर उसे तुरंत प्रताड़ित कर तलाक दे देता है। वह परिवार नियोजन में विश्वास नहीं रखता, घेटो (एक अलग-थलग बस्ती) में रहने वाले लोगों जैसी मानसिकता रखता है, आधुनिक शिक्षा से दूर रहता है, वंदे मातरम् का विरोध करता है, बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण, सलमान रश्दी, तस्लीमा नसरीन, डेनिश कार्टून आदि के चक्रव्यूह में फंसा रहता है आदि। मुसलमानों की एक और छवि यह बनाई गई है कि वे अपनी अंधेरी, बदबूदार, जर्जर बस्तियों में रहना पसंद करते हैं। उनके बच्चे गलियों की कीचड़-मिट्टी में लोटते रहते हैं और गुल्ली-डंडा या प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेलते रहते हैं। मुसलमानों के बारे में मीडिया की बनाई गई छवियों में से एक छवि यह है कि वे अपनी औरतों और बच्चियों को आधुनिक तो क्या, प्राचीन शिक्षा भी देना पसंद नहीं करते है। वे औरतों को अपने समाज में कोई हक नहीं देते, जिससे मुस्लिम महिलाएं लाचारी का जीवन बिताती हैं। मुस्लिम पुरुष जब चाहते हैं, तब शादी कर लेते हैं और जब चाहते हैं तलाक भी दे देते हैं और यह नहीं सोचते कि तलाक देने से उस औरत का क्या होगा।



बेवजह गुणगान 

इसके अलावा मुसलमानों की एक और छवि यह है कि वे सद्दाम हुसैन, तालिबान, अरब देशों जैसे फलस्तीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि के गुणगान में लगे रहते हैं, जबकि इन देशों को भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं। आम मुसलमानों के बारे में एक छवि भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई है। इनके अनुसार सभी मुसलमान अल्पसंख्यकवादी हैं और वे चुनाव में प्राय: मुस्लिम प्रत्याशी को ही वोट देते हैं। यह भी माना जाता है कि मुसलमान धर्म के आधार पर मतदान करते हैं आदि।

सचाई यह है कि इन सभी छवियों में से मुसलमान की एक भी छवि वास्तविक नहीं है। मुस्लिम विचारक और लेखक अजीज बर्नी के मुताबिक, मुसलमान की बस एक ही छवि है कि वह टूट कर इस्लाम को चाहने वाला होता है, अपने रसूल से बेपनाह मुहब्बत करता है और अपने धर्म, रसूल पर किसी भी समय मर-मिटने के लिए तैयार रहता है। पर एक सही बात यह भी है कि इन बनी-बनाई छवियों के आधार पर भारत में बसे मुसलमानों का आकलन नहीं हो सकता।

जब देश का विभाजन हो रहा था तो उस समय भारत के बहुलतावादी समाज के समर्थक स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से एक ऐसा झकझोर कर देने वाला भाषण दिया था कि पाकिस्तान जाने वाले अनेक लोगों ने अपने बिस्तरबंद खोल दिए थे और मौलाना के इस शेर पर लब्बैक कहा था (सहमति जताई थी), 'जो चला गया उसे भूल जा, हिंद को अपनी जन्नत बना।'

पर यहां रुक जाने और इस वतन को अपना मानने के बावजूद भारतीय मुसलमान को शक की नजर से क्यों देखा जाता रहा है? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि खुद उसके मन में यहां के समाज को लेकर कोई डर बैठ गया था? असल में, विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों के मन में असुरक्षा, हताशा और अनिश्चितता की भावना समा गई थी। समाज विश्लेषक वी. एन. पांडे ने इस स्थिति का उल्लेख करते हुए लिखा है, 'मुसलमानों को आशाएं कम थीं और भय अधिक थे।'

नेतृत्व से मिली उपेक्षा 

एक विडंबना मुसलमानों के नेताओं के साथ रही, जिनके कारण आज मुसलमान इतने पिछड़े हुए हैं। अगर मुस्लिम नेता ईमानदारी से अपने समुदाय के नेतृत्व की बागडोर संभालते तो आज मुसलमानों की तुलना समाज के सबसे पिछड़े वर्गों से नहीं होती। एक तो अपने नेताओं की उपेक्षा और दूसरी तरफ वैमनस्य का वातावरण, इन दोनों वजहों से भारतीय मुसलमानों में खीझ बढ़ती गई और वे मुख्य धारा से दूर खिंचते चले गए। उनके इस रवैये से सांप्रदायिकता की आग को भी हवा मिली। इन सारी वजहों के नतीजे में आज भारत का मुस्लिम समुदाय मुसलमान बिखरा-बिखरा सा नजर आता है।

भारतीय मुसलमान की दशा में सुधार आ सकता है, बशर्ते इस समुदाय की रूढ़ हो चुकी छवि में कोई सुधार हो। इसके लिए सबसे पहली जरूरत यह है कि हमारा मुस्लिम समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान के मुद्दों से परे हटे। मुसलमान अपने को मुख्य धारा से जितना हटा कर अपने अलग-थलग प्रमाणित करना चाहेंगे, अपनी छवि सुधारने में उन्हें उतना ही ज्यादा वक्त लगेगा। उन्हें एक सामान्य मनुष्य व देश के अन्य नागरिकों के समान अधिकारों की मांग और जिम्मेदारियों की पहचान करनी होगी। साथ ही दूसरे धर्मों-समुदायों के लोगों के साथ सद्भावना के साथ समानता पर आधारित तालमेल बिठाने की गुंजाइश पैदा करनी होगी।



Source:www.nbt.in

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